हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न आपदा पर मंथन

हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न आपदा पर मंथन
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पूर्व चेतावनी प्रणाली को प्रभावी बनाने पर जोर

डॉ. आर.एस. टोलिया उत्तराखण्ड प्रशासनिक अकादमी, नैनीताल में GLOF विषय पर महत्वपूर्ण कार्यशाला आयोजित

नैनीताल। डॉ. आर.एस. टोलिया उत्तराखण्ड प्रशासनिक अकादमी, नैनीताल में महानिदेशक वी.पी. पाण्डे के दिशा-निर्देशों के क्रम में हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न संभावित आपदाओं के जोखिम एवं उनसे निपटने की रणनीति (Glacial Lake Outburst Flood – GLOF) विषय पर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों, भू-विज्ञानियों, प्रशासनिक अधिकारियों तथा विभिन्न तकनीकी संस्थानों के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग कर हिमालयी क्षेत्रों में हिमनद झीलों से उत्पन्न आपदा के खतरों और उनके प्रभावी प्रबंधन पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न संभावित आपदाओं के जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन करना, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करना, हिमनद झीलों की निरंतर निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) का विकास तथा आपदा की स्थिति में त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई के लिए ठोस रणनीति तैयार करना रहा।
इस अवसर पर एससीईआरटी उत्तराखण्ड के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण प्रकोष्ठ के राज्य सह-समन्वयक विनय थपलियाल एवं भुवनेश पंत ने बताया कि उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्य में हिमनद झीलों से उत्पन्न जोखिमों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों एवं हिमनद झीलों की परिस्थितियों में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। ऐसे में संभावित खतरों की समय रहते पहचान, वैज्ञानिक निगरानी, जन-जागरूकता तथा विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों ने किया कार्यशाला का शुभारंभ

कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य अतिथि अपर सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग, देहरादून श्री प्रकाश चन्द्र तथा विशिष्ट अतिथि मेजर जनरल सुधीर बहल, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), नई दिल्ली, पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक, पद्मश्री श्री अनूप साह एवं संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ।
कार्यक्रम के प्रारंभ में संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार ने सभी अतिथियों एवं विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए कार्यशाला की उपयोगिता और वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा तथा हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से महत्वपूर्ण सबक लेने की आवश्यकता है। भविष्य में ऐसी आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी क्षमता, बेहतर विभागीय समन्वय तथा पूर्व नियोजित आपदा प्रबंधन रणनीति विकसित करना समय की मांग है।
शासन स्तर पर हिमनद झीलों के वैज्ञानिक अध्ययन एवं निगरानी के प्रयास
मुख्य अतिथि श्री प्रकाश चन्द्र ने हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न संभावित जोखिमों के संबंध में शासन स्तर पर किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य में विभिन्न हिमनद झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन एवं जोखिम आकलन किया जा रहा है। इसके साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है, जिससे संभावित खतरे की सूचना समय रहते संबंधित प्रशासनिक इकाइयों एवं स्थानीय समुदायों तक पहुंचाई जा सके।
उन्होंने कहा कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए वैज्ञानिक संस्थानों, प्रशासनिक तंत्र एवं आपदा प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों के बीच समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से आयोजित कार्यशाला भविष्य की रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
सिक्किम आपदा के अनुभवों से मिली महत्वपूर्ण सीख
विशिष्ट अतिथि मेजर जनरल सुधीर बहल ने हिमनद झीलों से उत्पन्न खतरों तथा उनके प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने सिक्किम में हिमनद झील फटने से उत्पन्न आपदा से जुड़े अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि ऐसी आपदाओं में समय रहते चेतावनी मिलना, त्वरित प्रतिक्रिया देना तथा विभिन्न सरकारी एवं तकनीकी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल होना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन केवल घटना के बाद राहत एवं बचाव कार्यों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि जोखिम की पूर्व पहचान, तैयारी, प्रशिक्षण एवं जनभागीदारी को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
इस अवसर पर पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक एवं पद्मश्री श्री अनूप साह ने भी हिमालयी पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों, पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता तथा आपदाओं के सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए।

प्रथम तकनीकी सत्र में देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने रखे विचार

कार्यशाला के प्रथम तकनीकी सत्र में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) विषय पर विस्तृत एवं तकनीकी चर्चा की गई। इस सत्र में वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान, देहरादून के डॉ. डी.पी. डोभाल एवं डॉ. जयराम, आईसीआई, एमओडी नेपाल के डॉ. फारूख आजम, सेवानिवृत्त एडीजीएम डॉ. आनंद शर्मा, डॉ. आर.के. श्रीवास्तव, जी.बी. पंत विश्वविद्यालय पंतनगर, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. राजीव उपाध्याय, यूएसडीएमए देहरादून के जीआईएस विशेषज्ञ श्री रोहित कुमार, आईआईआरएस देहरादून के डॉ. हरीश कर्नाटक, सीबीआरआई रुड़की के डॉ. राजेश दास तथा डॉ. एन.एल. ठकुराल सहित विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञों ने प्रतिभाग किया।
विशेषज्ञों ने हिमनद झीलों की पहचान एवं उनकी निरंतर निगरानी, संवेदनशील क्षेत्रों का वैज्ञानिक एवं भौगोलिक आकलन, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, झीलों के जलस्तर एवं संरचनात्मक बदलाव, संभावित खतरों की पूर्व पहचान तथा आपदा की स्थिति में त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर तकनीकी जानकारी साझा की।
आपदा प्रबंधन में पूर्व चेतावनी एवं जन-जागरूकता की महत्वपूर्ण भूमिका
कार्यशाला में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि हिमनद झीलों से उत्पन्न आपदाओं का प्रभाव केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नदियों के निचले क्षेत्रों में बसे गांवों, कस्बों, आधारभूत संरचनाओं, सड़कों, पुलों, विद्युत परियोजनाओं तथा जनजीवन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों का उपयोग करते हुए जोखिम मानचित्र तैयार करना, संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था विकसित करना, प्रभावी संचार तंत्र स्थापित करना तथा स्थानीय समुदायों को आपदा से निपटने के लिए प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
इस संदर्भ में शिक्षा विभाग एवं एससीईआरटी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि विद्यालयों के माध्यम से विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं समुदायों तक आपदा संबंधी जानकारी और जागरूकता पहुंचाई जा सकती है। विद्यालयों में आपदा प्रबंधन संबंधी प्रशिक्षण, मॉक ड्रिल, जागरूकता कार्यक्रम तथा स्थानीय जोखिमों की जानकारी उपलब्ध कराना भविष्य की आपदा तैयारियों को मजबूत करने में सहायक हो सकता है।
विभिन्न संस्थानों के समन्वय से तैयार होगी प्रभावी रणनीति
कार्यशाला में हुए विचार-विमर्श से यह स्पष्ट हुआ कि GLOF जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए केवल एक विभाग अथवा संस्था के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए वैज्ञानिक संस्थानों, आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, प्रशासन, शिक्षा विभाग, स्थानीय निकायों तथा समुदायों के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।
कार्यशाला का संचालन कार्यक्रम निदेशक डॉ. मंजू पाण्डे ने किया। इस अवसर पर अकादमी के श्री वी.के. सिंह, श्री रिचांशु शर्मा, श्रीमती पूनम पाठक, श्रीमती पूनम पंत, डॉ. अनिल मिश्रा, नायक एवं समन्वयक डॉ. ओमप्रकाश सहित अकादमी के अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
कार्यशाला ने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक आपदा जोखिमों के प्रति वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक तैयारी को मजबूत करने, पूर्व चेतावनी प्रणाली के विकास तथा जन-जागरूकता के माध्यम से आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में अपनी उपयोगिता स्थापित की।

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