पॉलीहाउस योजना में 112 करोड़ के भुगतान पर उठे सवाल

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कलकत्ता की कंपनी से 38 करोड़ की रिकवरी ?

पॉली हाउस घोटाले पर कांग्रेस ने तरेरी आंखे

बाकी 78 करोड़ पर सवाल ही सवाल

ऑडिट, निरीक्षण और जवाबदेही पर कांग्रेस ने घेरा

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। किसानों की आय बढ़ाने और संरक्षित खेती को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से शुरू की गई उत्तराखंड की पॉलीहाउस योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है।

योजना के तहत एक निजी कंपनी को किए गए करीब 112 करोड़ रुपये के भुगतान को लेकर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।
आरोप हैं कि कई स्थानों पर पॉलीहाउस अधूरे थे या निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए, इसके बावजूद भुगतान जारी कर दिया गया। घोटाला उठने के बाद 38 करोड़ रुपये वापस जमा कर दिए गए। और अब शेष करीब 74 करोड़ रुपये के भुगतान और उसकी स्वीकृति प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा ने कहा कि महत्वाकांक्षी पॉलीहाउस योजना का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों सहित पूरे प्रदेश में किसानों को आधुनिक खेती से जोड़ना, सब्जी, फूल और उच्च मूल्य वाली फसलों का उत्पादन बढ़ाना तथा उनकी आय में वृद्धि करना था। लेकिन अब इसी योजना के वित्तीय प्रबंधन और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

आरोप है कि योजना के तहत कलकत्ता की Draithwet & Company को लगभग 112 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया, जबकि कई स्थानों पर पॉलीहाउस का निर्माण अधूरा था या गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतर रहा था।

उन्होंने कहा कि इस कंपनी को रेलवे के कार्य का अनुभव है। लेकिन बागवानी का कोई अनुभव नहीं है। माहरा ने विभागीय मंत्री व अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।।

उन्होंने कहा कि ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि भुगतान से पहले भौतिक सत्यापन, तकनीकी परीक्षण और गुणवत्ता निरीक्षण किस स्तर पर किया गया। माहरा ने पॉली हाउस घोटाले की जांच की मांग की है।।

आपत्तियां सामने आने के बाद कंपनी से करीब 38 करोड़ रुपये वापस जमा कराए गए। हालांकि, लगभग 74 करोड़ रुपये के भुगतान को लेकर अब भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। इसे लेकर प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर जवाबदेही तय करने की मांग तेज हो रही है।
मामले में यह भी पूछा जा रहा है कि भुगतान की अनुमति किस अधिकारी या समिति ने दी, निरीक्षण रिपोर्ट किस आधार पर तैयार हुई और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच अब तक किस स्तर पर पहुंची है। यदि जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होती है तो सरकारी धन की वसूली के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पक्षों पर कार्रवाई की मांग भी उठ रही है।

यह योजना मुख्यतः राष्ट्रीय बागवानी मिशन (NHM)/मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) के तहत संचालित की जाती रही है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की हिस्सेदारी होती है।
यदि भुगतान बिना कार्य पूर्ण हुए किया गया है, तो मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं बल्कि जीएफआर (General Financial Rules) और सरकारी खरीद/भुगतान प्रक्रिया के उल्लंघन का भी हो सकता है।

करण माहरा ने कहा कि
यह पता लगाया जाना महत्वपूर्ण होगा कि क्या मामले की जांच महालेखाकार (AG) की ऑडिट आपत्तियों, विभागीय जांच, सतर्कता (विजिलेंस) या किसी अन्य एजेंसी की रिपोर्ट के बाद शुरू हुई।
यह भी महत्वपूर्ण तथ्य होगा कि कितने पॉलीहाउसों का भौतिक सत्यापन हुआ, कितने अधूरे पाए गए और कितने किसानों को वास्तविक लाभ मिला।

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