Uttarakhand: 25 साल में मानव-वन्यजीव संघर्ष ने ली 954 लोगों की जान, तेंदुए सबसे घातक !

Uttarakhand: 25 साल में मानव-वन्यजीव संघर्ष ने ली 954 लोगों की जान, तेंदुए सबसे घातक !
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उत्तराखंड में इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ता टकराव अब कई इलाकों के लिए गंभीर खतरा बन गया है। जंगलों के आसपास बस्तियों के विस्तार और वन्यजीवों की बढ़ती मौजूदगी से संघर्ष की घटनाएं लगातार चिंता बढ़ा रही हैं।

उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। वन्यजीवों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। हाल के आंकड़ों के अनुसार राज्य में भालुओं की संख्या करीब 3,200 है, जो सबसे अधिक है। इसके बाद तेंदुओं की संख्या 2,276, हाथियों की संख्या 2,026 और बाघों की अनुमानित संख्या 560 है। इनमें 260 बाघ कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में पाए जाते हैं।

यह बात मूल रूप से चमोली जिले के रहने वाले मिजोरम विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर व स्कूल ऑफ अर्थ साइंसेज एंड नेचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट के डीन विश्वंभर प्रसाद सती के अध्ययन में सामने आई हैं। उन्होंने बताया कि जिलेवार आंकड़ों के मुताबिक पौड़ी में तेंदुओं की संख्या सबसे अधिक है और भालू मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं का प्रमुख कारण हैं।

नैनीताल में बाघों और तेंदुओं की बड़ी संख्या संघर्ष को बढ़ाती है। इसका प्रमुख कारण कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की निकटता है। हरिद्वार में हाथियों की संख्या अधिक है और देहरादून-हरिद्वार रेलवे लाइन पर हाथियों की मौत की घटनाएं सामने आती रहती हैं। इसके पीछे उचित रूप से डिजाइन किए गए हाथी गलियारे का अभाव प्रमुख कारण है। टिहरी भी तेंदुए और भालू के साथ संघर्ष के कारण राज्य के प्रमुख हॉट स्पॉट में शामिल है।

भालू संघर्ष में सबसे आगे, फसलों को भी नुकसान

देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में हाथियों का प्रभुत्व है। कुल मिलाकर भालू से संबंधित संघर्ष की घटनाएं सबसे अधिक हैं और मानवों के घायल होने और मृत्यु के मामलों में भी भालू प्रमुख कारण हैं। मध्य हिमालयी क्षेत्र में भालू प्रमुख संघर्षकारी वन्यजीव हैं, जबकि तेंदुए भी संघर्ष की आवृत्ति और मानव हताहतों के मामले में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। जंगली सूअर और लंगूर खड़ी फसलों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं।

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