सीमांत उत्तरकाशी के भूटाणु गाँव में डटे हैं सिर्फ कमल सिंह और छुम्मा देवी

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एक गांव- 25 साल से सड़क का इंतज़ार, आपदा में पैदल मार्ग भी बहा

वरिष्ठ पत्रकार संदीप गुसाईं की हकीकत से रूबरू कराती ग्राउंड ज़ीरो रिपोर्ट

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के सीमांत विकासखंड मोरी के बंगाण क्षेत्र का भूटाणु गाँव लगभग उजड़ चुका है। पब्बर नदी के किनारे बसे इस गाँव की छानियाँ नदी से लगे इलाके में हैं।

पब्बर नदी के उस पार त्यूणी से रोहडू को जोड़ने वाला नेशनल हाईवे तो है, लेकिन नदी के इस पार रहने वाले परिवारों तक पहुँचने के लिए न सड़क है और न सुरक्षित पैदल मार्ग।

त्यूणी से करीब 4 किलोमीटर आगे नदी के पार कुछ परिवार रहते हैं, जो सुविधाओं के अभाव में पलायन करने को मजबूर हो गए। पिछले 25 सालों से ग्रामीण सड़क की मांग करते रहे, लेकिन आज तक यह मांग पूरी नहीं हुई। नतीजा यह कि अधिकांश परिवार गाँव छोड़कर या तो सड़क के किनारे, या फिर त्यूणी और देहरादून में बस गए।

लेकिन इसी वीरान होते गाँव में कमल सिंह (70 वर्ष) और उनकी पत्नी छुम्मा देवी अपनी पैतृक जमीन और खेतों के साथ अब भी डटे हुए हैं। दोनों यहाँ सेब, आलू, टमाटर और राजमा की खेती करते हैं।

कमल सिंह बताते हैं कि एक समय था जब यहाँ खेतों में हरियाली छाई रहती थी। लोगों के पास आराम का समय नहीं था क्योंकि दो जगहों पर खेती होती थी, लेकिन अब सब सुनसान होता जा रहा है।

इस क्षेत्र के लोग लंबे समय से सड़क चाहते हैं, लेकिन हालात इतने खराब हैं कि 2023 में आई आपदा में झूला पुल से जाने वाला पैदल मार्ग भी बह गया। तब से ग्रामीण जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं।

स्थानीय लोग बताते हैं कि अगर क्षेत्र में सड़क बन जाए तो यहाँ टमाटर, कीवी, जापानी फल (पर्शिमन), प्याज़, लहसुन और कई तरह की सब्ज़ियों का बड़ा उत्पादन हो सकता है। आज भी कुछ स्थानीय परिवार और कुछ गुर्जर परिवार बिना सड़क के ही यहाँ खेती कर रहे हैं।

जल्द ही Rural Tales पर इस पूरे क्षेत्र की विस्तृत कहानियाँ प्रकाशित होंगी, जिन्हें आप YouTube पर देख सकते हैं।

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