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स्मृति शेष-व्योमेश जुगरान कि कलम से
अविकल उत्तराखंड
देहरादून- फरवरी 2007 में उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में जनरल भुवन चन्द्र खंडूड़ी स्वयं अपनी पार्टी भाजपा के लिए एक आकर्षक चुनावी वादा बन गए। देहरादून की जनसभा में अटल बिहारी वाजपेयी ने खंडूड़ी जी का हाथ उठाकर लोगों से कहा- ‘आप भाजपा को वोट दें, हम आपको खंडूड़ी देंगे…। किसी राजनेता के राजनीतिक जीवन में ऐसा मौका दुर्लभ होता है जब उसकी बेदाग छवि के आगे तमाम लोकलुभावन चुनावी नारे फीके पड़ जाएं !
उत्तराखंड राज्य की तत्कालीन परिस्थितियों को शायद वाजपेयी जी बखूबी भांप रहे थे। केंद्र से मिले विशेष राज्य के दर्जे के बावजूद उत्तराखंड पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा था और इसके बीमारू राज्य की खोह में जाने के खतरे बढ़ गए थे। खंडूड़ी केंद्र की वाजपेयी सरकार के ईमानदार और कुशलतम मंत्रियों में रह चुके थे- एकदम जांचा-परखा सोना ! फौजी पृष्ठभूमि का तमगा भी उन्हें दूसरों से अलग करता था। उत्तराखंड की तत्कालीन परिस्थितियों में जाहिर है, खंडूड़ी एक शानदार नाम और बेहतरीन चयन था।
चुनाव में विजय के बाद वह मुख्यमंत्री बने और उन्होंने प्रशासनिक सुधार, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और राजकीय कोष की सुध लेना शुरू किया। जब उनकी कार्यशैली खासकर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और फिजूलखर्ची पर ताबड़तोड़ प्रहार करने वाली साबित होने लगी तो देहरादून से लेकर दिल्ली तक नेताओं-नौकरशाहों की मजबूत लॉबी जनरल के ‘छावनी राज’ से तिलमिला उठी। दुर्भाग्य से 2009 के लोकसभा चुनावों में उत्तराखंड में भाजपा के सफाए ने इस लॉबी को खंडूड़ी को ‘ठिकाने लगाने’ का आसान मौका दे दिया।
और खंडूड़ी हटा दिए गए। उनके उत्तराधिकारी उत्तराखंड को न सिर्फ पुराने ढर्रे, बल्कि और भी बदतर स्थिति में पहुंचाने वाले सिद्ध हुए। देखते-देखते 2012 के विधानसभा चुनाव सिर पर आ गए और चुनावों में ‘बाट’ लगती देख पार्टी को फिर खंडूड़ी याद आए।
26 माह बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी दोबारा उन्हें सौंप दी गई। मात्र चार माह के कार्यकाल के भीतर लोकायुक्त जैसे कानून बनाकर वह पार्टी को जीत के मुहाने तक तो ले आए, लेकिन पार्टी में भितरघातियों की कारस्तानी के कारण कोटद्वार से अपना चुनाव हार बैठे। मगर, इस हार ने उनके राजनीतिक कद को और बड़ा बना दिया। वह भितरघातियों के व्यूह में लड़े सेनानायक कहे गए। उनकी हार ने ‘षड्यंत्रकारी जयद्रथों’ के तमाम छप्र-प्रपंचों की असलियत खोल कर रख दी।
वक्त के उस मोड़ ने उत्तराखंड को ईमानदारी और शुचिता की राजनीति की ओर बढ़ने का एक शानदार अवसर दिया था। पर, कोटद्वार की हार से वह हमेशा के लिए हाथ से निकल गया।
आज जनरल खंडूड़ी बेशक हमारे बीच से विदा हो गए, पर शुचिता और ईमानदारी की राजनीति पर जब भी बात होगी, वह हमेशा प्रथम पंक्ति में नजर आएंगे।
जनरल साहब को हमारा सैल्यूट!
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