दिल्ली में शुरू होंगी उत्तराखण्ड की बोलियों की कक्षाएं

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गढ़वाली-कुमाऊंनी और जौनसारी बोली-भाषा की ग्रीष्मकालीन कक्षाएं

अविकल उत्तराखंड

नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए ‘उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच’ द्वारा हर साल गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी बोली/ भाषाओं की ग्रीष्मकालीन कक्षाएं चलाई जाती हैं।
उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच दिल्ली के संरक्षक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पटल पर दिल्ली-एनसीआर में पहाड़ की सशक्त आवाज़ डॉ.विनोद बछेती के नेतृत्व में वर्ष 2012 से इन ग्रीष्मकालीन कक्षाओं को सफलतापूर्वक संचालित किया जा रहा हैं।

‘उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच’ की यह अनूठी पहल दिल्ली-एनसीआर में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडियों के बच्चों को अपनी जड़ों,लोक संस्कृति,खान-पान और अपनी भाषा-बोली से रू-ब-रू तो करवा ही रहे है। इसके साथ ही बच्चे इस पहल के माध्यम से अपनी मातृ भाषा,लोकगीत,नाटक,रीति-रिवाज और पारंपरिक लोक नृत्य भी सीख रहे हैं। यही वजह भी हैं कि आज उत्तराखंड की लोक भाषाओं गढ़वाली,कुमाऊंनी व जौनसारी को बोलने और सीखने वालों की संख्या दिल्ली-एनसीआर में लगातार बढ़ रही है।

इस क्रम में इस वर्ष 24 मई 2026 से ग्रीष्मकालीन कक्षाओं का शुभारंभ किया जा रहा है। जिसमें अपनी भाषा-बोली सीखने के लिए बड़ी संख्या में पहाड़ के नौनिहाल और उनके परिजनों के साथ-साथ गढ़वाली-कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं को पढ़ाने वाले शिक्षक अपनी-अपनी भागीदारी निभाने के लिए तैयार है।

दिल्ली-एनसीआर में पिछले 15 वर्षों से गढ़वाली- कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं की ग्रीष्मकालीन शिक्षण कक्षाओं का सफलतापूर्वक संचालन 52 केंद्रों में किया जा रहा है। इसमें कुछ केंद्र उत्तराखंड में भी है। यह अनूठी पहल बच्चों को अपनी जड़ों,लोक संस्कृति,खान-पान और भाषाओं से जोड़ने के लिए हर साल मई-जून-जुलाई में आयोजित की जाती है। जिसके माध्यम से आज के समय में पहाड़ के नौनिहाल बड़ी संख्या में गढ़वाली-कुमाऊंनी- जौनसारी बोल ही नहीं रहे है बल्कि दूसरे लोगों को भी अपनी भाषा बोलने के लिए प्रेरित कर रहे है।

इस भागीरथी प्रयास के मुख्य उद्देश्य की बात करें तो प्रवासी उत्तराखंडी बच्चों को अपनी बोली-भाषा पढ़ना-लिखना सिखाना और लोक संस्कृति से परिचित कराना तो हैं ही,साथ ही गढ़वाली,कुमाऊनी,जौनसारी भाषाओं को 8वीं अनुसूची में दर्ज कराना भी इसका मुख्य उद्देश्य है।

हम बच्चों को अपनी जड़ों और अपनी लोक सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रहे है-डॉ.विनोद बछेती,संरक्षक-उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच

उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच के संरक्षक एवं दिल्ली-एनसीआर में पहाड़ की सशक्त आवाज़ एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पटल पर पहाड़ को एक जुट एक मुट कर अपने रीति-रिवाजों और लोक परिवेश को नई पहचान दिलाने वाले डॉ.विनोद बछेती के मार्गदर्शन में एवं दिल्ली-एनसीआर में अपनी भाषा को बचाए रखने के लिए निरंतर प्रयासरत कई भाषा प्रेमियों की अथक मेहनत और कठोर परिश्रम का सफल परिणाम हैं कि आज दिल्ली-एनसीआर में पिछले 15 वर्षों से ग्रीष्मकालीन कक्षाओं का निरंतर संचालन किया जा रहा है।

उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच के संरक्षक डॉ.विनोद बछेती इस बारे में बताते है कि बहुत अजीब लगता है जब हम बहुत से पहाड़ के लोगों एक साथ खड़े हों और हम अपनी भाषा-बोली में बात न करें।

इस तरह के माहौल में,मैं खुद को बहुत असहज महसूस करता हूं। इस धारणा को बदलने के लिए हमने दिल्ली एनसीआर में रह रहे नौनिहालों को अपनी मातृ भाषा से जोड़ने के लिए गढ़वाली-कुमाऊंनी और जौनसारी की ग्रीष्मकालीन कक्षाओं की शुरूआत की,इसके लिए हमारे समाज का एक बड़ा तकबा हमारे साथ खड़ा हुआ और आज मुझे कहने में खुशी होती है कि हमारे नौनिहाल आज अपनी भाषा-बोली में बात करते है,अपने संस्कार-रीति-रिवाजों को जानते है और इस कड़ी में हमने अब एक और नई पहल की है। जिसके तहत हम बच्चों को गढ़वाली-कुमाऊंनी

नाटक एवं लोकगीतों की बारिकियों को भी सीखा रहे है। इसके माध्यम से हमारे बहुत सारे बच्चे और उत्सुकता के साथ हमारे इस परिवार में शामिल हो रहे है और अपनी भाषा-बोली सीख रहे है।

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