विश्व जैव विविधता दिवस पर पर्यावरण संरक्षण का संदेश

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स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले— “प्रकृति का संरक्षण ही मानवता का संरक्षण”

अविकल उत्तराखंड

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में आयोजित पर्यावरण समर्पित मासिक श्रीराम कथा में विश्व जैव विविधता दिवस के अवसर पर प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का संदेश दिया गया। इस दौरान स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास को सनातन संस्कृति का जीवंत पर्यावरण दर्शन बताते हुए कहा कि श्रीराम का जीवन मानव और प्रकृति के दिव्य सहअस्तित्व का शाश्वत संदेश देता है।

उन्होंने कहा कि जब-जब मानव प्रकृति से दूर हुआ है, तब-तब अशांति, असंतुलन और विनाश बढ़ा है। वहीं प्रकृति को माँ मानकर उसका सम्मान करने से धरती पर समृद्धि, शांति और दिव्यता का संचार होता है। सनातन संस्कृति का मूल ही प्रकृति के प्रति श्रद्धा है, जहां नदियों को जीवनदायिनी, वृक्षों को जीवनदाता और पर्वतों को देवस्वरूप माना गया है।

स्वामी जी ने कहा कि भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान चित्रकूट, पंचवटी और दंडकारण्य जैसे वन क्षेत्रों में रहकर प्रकृति के प्रति सम्मान, संवेदना और समर्पण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति “भोग नहीं, योग; उपभोग नहीं, संरक्षण” का मार्ग दिखाती है, जो आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की आधारशिला है।

उन्होंने कहा कि वन पृथ्वी की प्राणशक्ति हैं। यदि वन सुरक्षित हैं तो जल, वर्षा और जीवन भी सुरक्षित रहेगा। इस अवसर पर श्रद्धालुओं को पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प भी दिलाया गया।
कार्यक्रम में श्रीराम कथा व्यास संत मुरलीधर जी महाराज एवं उनकी धर्मपत्नी मीना जी को 35वीं वैवाहिक वर्षगांठ पर शुभकामनाएं दी गईं। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने दोनों के स्वस्थ, सुखद और दीर्घायु जीवन की कामना करते हुए उनके धर्म, संस्कृति और मानवता के प्रति समर्पण को प्रेरणादायी बताया।

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