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तेज बहाव में बहते 3-4 दिन के हाथी शावक को मछुआरों ने बचाया
दो घंटे की भावुक तलाश के बाद मां से हुआ मिलन
गजोलडोबा….
तीस्ता नदी का तेज बहाव उस दिन सिर्फ पानी नहीं बहा रहा था, बल्कि एक नन्हे जीवन को उसकी मां से दूर ले जा रहा था। महज 3-4 दिन का हाथी का बच्चा, जो अभी दुनिया को ठीक से समझ भी नहीं पाया था, अचानक नदी की प्रचंड धार में फंस गया। मां से बिछड़कर बहता यह मासूम जीवन मौत और जिंदगी के बीच झूल रहा था।
लेकिन इंसानियत ने उस दिन नदी की धार से मुकाबला किया।
तीस्ता बैराज के ऊपरी हिस्से से बहते हुए जब इस नन्हे हाथी को स्थानीय मछुआरों ने देखा, तो वे अपनी जान की परवाह किए बिना उसे बचाने के लिए नदी में उतर पड़े। तेज धारा के बीच शावक को पकड़ना आसान नहीं था। हर पल खतरा था, लेकिन उसकी बेबसी देखकर मछुआरों ने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
अजय दास, राजेश दास, गोपाल दास, मिट्टू दास और बिश्वनाथ दास ने साहस दिखाते हुए आखिरकार शावक को नदी की धार से बाहर निकाला और सुरक्षित रूप से नदी के एक टापू तक पहुंचाया।

लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
नन्हा शावक सुरक्षित तो था, मगर उसकी आंखें लगातार अपनी मां को खोज रही थीं। वह बार-बार अपनी मां को पुकार रहा था। उसकी वह करुण आवाज नदी के किनारे मौजूद लोगों के दिल को छू रही थी। वह आवाज जैसे सिर्फ एक बच्चे की पुकार नहीं, बल्कि अपनी मां तक पहुंचने की आखिरी उम्मीद थी।
इसी बीच बैकुंठपुर वन प्रभाग के वनकर्मी भी मौके पर पहुंच गए। अब बचाव अभियान का अगला और सबसे भावुक अध्याय शुरू हुआ मां और बच्चे को फिर से मिलाने का प्रयास।
वनकर्मियों और स्थानीय लोगों ने आसपास के नदी-द्वीप क्षेत्र में मां हाथी की तलाश शुरू की। शावक की आवाज को उम्मीद की डोर बनाया गया। करीब दो घंटे तक लगातार प्रयास चलता रहा।
नदी के टापुओं, किनारों और आसपास के क्षेत्र में तलाश जारी रही। हर गुजरते पल के साथ चिंता बढ़ रही थी। एक तरफ नवजात शावक अपनी मां के लिए बेचैन था, दूसरी ओर उसकी मां भी अपने बच्चे की तलाश में भटक रही थी।

फिर वह क्षण आया, जिसका इंतजार सभी कर रहे थे। मां और उसके नन्हे बच्चे का मिलन हो गया।
तीस्ता के नदी-द्वीप क्षेत्र में जब शावक अपनी मां के करीब पहुंचा, तो मानो पूरी घटना की सारी बेचैनी एक पल में खत्म हो गई। कुछ घंटे पहले तक तेज धार में बहता यह मासूम अब अपनी मां की सुरक्षा में था।
यह सिर्फ एक वन्यजीव बचाव अभियान नहीं था। यह मां और बच्चे के बीच उस अटूट रिश्ते की कहानी थी, जिसे नदी की प्रचंड धार भी तोड़ नहीं सकी।
इस घटना ने यह भी दिखाया कि मनुष्य और वन्यजीवों के बीच संवेदना और सह-अस्तित्व का रिश्ता कितना महत्वपूर्ण है। स्थानीय मछुआरों ने जिस तरह अपनी जान जोखिम में डालकर शावक को बचाया और वनकर्मियों ने उसकी मां को खोजकर दोनों को मिलाया, वह करुणा, साहस और वन्यजीव संरक्षण की एक प्रेरक मिसाल बन गया।
तीस्ता की लहरें उस दिन एक नन्हे हाथी को अपने साथ बहा ले जाना चाहती थीं, लेकिन कुछ संवेदनशील इंसानों ने मिलकर उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
मां की पुकार और बच्चे की आवाज आखिरकार एक-दूसरे तक पहुंच ही गई।
और शायद यही इस पूरी घटना का सबसे खूबसूरत संदेश है…
जब इंसानियत जागती है, तो किसी मासूम जिंदगी के लिए उम्मीद की राह जरूर निकलती है। (राहुल कुमार झा)
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