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मसूरी की यादें- जयप्रकाश उत्तराखंडी की कलम से
1899 में भयावह ‘छप्पनिया भूकंप’ में मसूरी राजस्थान और उत्तर भारत के गरीब मजदूरों की पनाहगार हो गयी थी।उस भूकंप में भारी भुखमरी फैली और उत्तर भारत में हाहाकार मच गया था।
India Directory 1903 की रिपोर्ट के अनुसार मसूरी में 1899 में करीब 600 मजदूर स्त्री पुरूष आये,जिन्हे अंग्रेजी सरकार द्वारा मसूरी के टेलर फ्लेट(सर्वे ग्राऊण्ड) और तारा हाल में ठहराया गया था।

साल 1899-1900 के बीच राजस्थानी स्त्री पुरुष मजदूर मसूरी के कैमल्स बैक रोड पर बजरी बिछाते नजर आ रहे हैं।कैमल्स बैक,माल रोड पर अंग्रेजी जमाने में साल में तीन बार बजरी बिछती थी और धूल से बचाव के लिए म्युनिसिपल भिश्ती सुबह शाम सड़कों पर पानी का छिड़काव करते थे।
एक म्युनिसिपल भिश्ती मेरे बचपन की याददाश्त में 1960 में मेरे बाजार लायब्रेरी में पानी छिड़कता था।शायद वही आखिरी था,उसके बाद भिश्ती कभी नजर नहीं आया।
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