हिंदी-उर्दू के संगम ने दिया एकता और सौहार्द का संदेश

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परवाज़-ए-अमन की महफ़िल में सजी शेरो-शायरी की महफिल

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। समाज और देश में प्रेम, सद्भावना तथा साहित्य के विकास व प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से समर्पित सामाजिक व साहित्यिक संस्था ‘परवाज़-ए-अमन’ के ओल्ड मसूरी रोड स्थित कार्यालय सभागार में कवियों, साहित्यकारों और शायरों की एक खूबसूरत महफ़िल आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश की जानी-मानी कवित्री डौली डबराल ने की, जबकि प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि हिंदी और उर्दू के कवियों व शायरों को एक मंच पर लाकर महफिल सजाना “सोने पर सुहागा” है। धस्माना ने कहा कि कोई भी भाषा तभी समृद्ध हो सकती है, जब वह समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार अन्य भाषाओं के अच्छे व उपयोगी शब्दों को अपने भीतर समाहित करे।

उन्होंने हिंदी और उर्दू को “सगी बहनें” बताते हुए कहा कि दोनों का एक-दूसरे के बिना अस्तित्व अधूरा है, लेकिन वोटों की सियासत ने इनके बीच दूरी पैदा करने का प्रयास किया है।

देहरादून के चर्चित शायर बदरुद्दीन जिया ने अपनी नज़्म—
“जब अयादत को वो सनम आया,
तब कहीं जाकर दम में दम आया”—
पेश कर खूब तालियां बटोरीं।
कार्यक्रम का संचालन मशहूर शायर शादाब मशहदी ने किया। उन्होंने अपनी ग़ज़ल—
“चिराग बनकर दुनिया में जगमगाते हैं,
वो अपने घर के अंधेरे से हार जाते हैं”—
सुना कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
नशिस्त की अध्यक्षता करते हुए कवित्री डौली डबराल ने महिला सम्मान पर केंद्रित अपनी रचना—
“पायदान पर नहीं, किसी की चौखट पर न पड़ी हुई हूं,
कोई दुत्कारे न मुझको, अपने दम पर खड़ी हुई हूं”—
प्रस्तुत कर सराहना प्राप्त की।
इसके अलावा युवा कवित्री मोनिका मंतशर, अमजद खान ‘अमजद’ और सुनील साहिल ने भी अपनी रचनाओं से श्रोताओं का मन मोह लिया।
कार्यक्रम की संयोजिका एवं ‘परवाज़-ए-अमन’ की अध्यक्ष अंबिका सिंह रूही ने सभी कवियों, शायरों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संस्था का उद्देश्य समाज में प्रेम, मोहब्बत और आपसी समझ को बढ़ावा देकर एक शांतिपूर्ण समाज का निर्माण करना है, और इसके लिए वे निरंतर प्रयासरत रहेंगी।

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